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Bankipur By Election Result: बांकीपुर में क्या बदलेगा 30 साल का इतिहास? जानिए सीट का पूरा चुनावी सफर और ताजा अपडेट

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Alam Ki Khabar: Bihar News, Patna News, Samastipur News, Rosra News के साथ पढ़ें बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की पूरी रिपोर्ट। जानिए सीट का इतिहास, पिछले चुनावों का रिकॉर्ड, भाजपा का तीन दशक का वर्चस्व और ताजा मतगणना अपडेट।

पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट एक बार फिर बिहार की राजनीति का केंद्र बन गई है। उपचुनाव की मतगणना जारी है और हर राउंड के साथ राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। यह चुनाव केवल एक विधायक चुनने का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि राजधानी की सबसे प्रतिष्ठित सीटों में से एक पर जनता के रुख को समझने का अवसर भी है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी अपने तीन दशक से अधिक पुराने राजनीतिक वर्चस्व को बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है, वहीं दूसरी ओर जन सुराज इस चुनाव को अपने राजनीतिक विस्तार की महत्वपूर्ण परीक्षा मान रहा है। राजद भी इस मुकाबले में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश में है।

मतगणना के शुरुआती चरणों में जन सुराज के प्रशांत किशोर बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा दूसरे और राजद की रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर चल रही हैं। हालांकि चुनाव आयोग की ओर से अंतिम परिणाम घोषित होना अभी बाकी है और कुल 31 राउंड की मतगणना पूरी होने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।

बांकीपुर क्यों है इतनी महत्वपूर्ण सीट?

बांकीपुर विधानसभा सीट को बिहार की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक सीटों में गिना जाता है। राजधानी पटना के मध्य स्थित होने के कारण यहां का जनादेश अक्सर राज्य की राजनीतिक दिशा का संकेत माना जाता है। राजनीतिक दल इस सीट को केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत की परीक्षा के रूप में देखते हैं।

पहले पटना पश्चिम, फिर बना बांकीपुर

आज जिसे बांकीपुर विधानसभा सीट के नाम से जाना जाता है, वह पहले पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र कहलाती थी। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर बांकीपुर कर दिया गया। नाम बदलने के बावजूद इस सीट का राजनीतिक महत्व लगातार बना रहा।

शुरुआती चुनावों का इतिहास

इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 1957 में हुआ था, जिसमें कांग्रेस के रामशरण साव विजयी हुए। इसके बाद 1962 में कृष्ण बल्लभ सहाय ने जीत दर्ज की। 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा विधायक बने। उनके इस्तीफे के बाद हुए 1969 के उपचुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के ए.के. सेन ने जीत हासिल की। वर्ष 1972 में CPI के सुनील मुखर्जी ने सीट बरकरार रखी।

1977 की जनता लहर में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद विजयी रहे, जबकि 1980 में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने सीट दोबारा कांग्रेस के खाते में पहुंचाई।

1985 का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर

बांकीपुर के चुनावी इतिहास में वर्ष 1985 सबसे अलग माना जाता है। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने सभी प्रमुख दलों को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। इसे आज भी इस सीट का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाता है।

1995 से भाजपा का अभेद्य किला

वर्ष 1995 में भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने इस सीट पर जीत दर्ज की और यहीं से भाजपा का लंबा विजय अभियान शुरू हुआ। उन्होंने 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 में लगातार जीत हासिल की।

2006 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। इसके बाद 2008 में सीट का नाम बदलकर बांकीपुर हुआ, लेकिन भाजपा की जीत का सिलसिला नहीं टूटा।

2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में भी नितिन नवीन लगातार विजयी रहे। वर्ष 2025 में उन्होंने लगभग 63 प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए 51 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। यही कारण है कि बांकीपुर को पिछले तीन दशक से भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है।

कई दिग्गजों को मिली हार

यह सीट केवल बड़ी जीतों की नहीं, बल्कि कई चर्चित हार की भी गवाह रही है। अभिनेता लव सिन्हा, पुष्पम प्रिया चौधरी, पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय और वरिष्ठ नेता राम कृपाल यादव जैसे कई चर्चित नाम इस क्षेत्र से चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सके। इससे स्पष्ट होता है कि बांकीपुर का मतदाता हर चुनाव में अपना अलग फैसला देने के लिए जाना जाता है।

मौजूदा उपचुनाव क्यों बना चर्चा का केंद्र?

इस बार का उपचुनाव कई मायनों में खास माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की चुनौती है, जबकि जन सुराज के लिए राजधानी में राजनीतिक स्वीकार्यता साबित करने का अवसर। राजद भी इस सीट पर बेहतर प्रदर्शन कर विपक्षी राजनीति को नई ऊर्जा देना चाहता है।

मतगणना अभी जारी है और चुनाव आयोग की ओर से प्रत्येक राउंड के बाद आधिकारिक अपडेट जारी किए जा रहे हैं। अंतिम परिणाम आने तक राजनीतिक दलों और समर्थकों की नजरें मतगणना केंद्र पर टिकी रहेंगी।

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संपादकीय: इतिहास बनता भी है और बदलता भी

बांकीपुर विधानसभा सीट का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता समय-समय पर बड़े राजनीतिक संदेश देते रहे हैं। कभी कांग्रेस, कभी वामपंथ, कभी निर्दलीय और फिर लगातार भाजपा—इस सीट ने हर दौर में अलग कहानी लिखी है। इसलिए किसी भी चुनाव को केवल पिछले रिकॉर्ड के आधार पर नहीं देखा जा सकता। लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता का होता है और वही इतिहास को आगे बढ़ाता या बदलता है। उपचुनाव का परिणाम चाहे जिस दल के पक्ष में जाए, यह स्पष्ट है कि बांकीपुर की राजनीति आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेत जरूर देगी।

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